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Tuesday, December 27, 2016

जय हनुमान

आज शुभ मंगलवार ..
संकट मोचक श्री हनुमान को शत शत नमन.. हम सब का मंगल करें ..
भजनामृत से ....
रचयिता : महाकवि  बृजेश सिंह ......

संकट मोचक आप शुचि, आपे कृपा निधान |
दया दृष्टि  ब्रजेश  मिले, जय जय जै हनुमान ||

कौन सुप्रिय श्रीराम को, आप सदृश संसार |
जिस पर  कृपा आप करें, राम  करें  उद्धार ||

सहज ही  सुफल देत हैं,  काटें  सबके  पीर |
कृपा दुःख मिटे बृजेश, जय जय हनुमत वीर ||

आप सा जग में कौन है, आपे आप समान |
बिगड़े  आपे  सँवारें,  राम  भक्त  हनुमान ||

Monday, December 19, 2016

भारत गौरव गान

राष्ट्र  जागरण - अस्मिता गान..

मतयगंद छंद 'आहुति' महाकाव्य से ....
महाकवि डॉ. बृजेश सिंह

राष्ट्र  जागरण - अस्मिता गान

राम की कृष्ण की पावन गाथा
  लसी हर गांव की माटी यहाँ है |
अर्जुन-भीम के शस्त्र की तीक्ष्ण
  प्रलम्ब रही परिपाटी यहाँ है |
राणा-शिवा-इतिहास लिए निज
  अंक खड़ी हर घाटी यहाँ है |
धारण की बसुधा ने सदा रण-
  रक्त रँगी शुचि शाटी यहाँ है ||

Sunday, December 18, 2016

अस्मिता शंखनाद

राष्ट्र  जागरण - अस्मिता शंखनाद

घनाक्षरी छंद 'आहुति' महाकाव्य से ....  
रचयिता राष्ट्रकवि डॉ. बृजेश सिंह

राष्ट्र जागरण - अस्मिता शंखनाद
राणा की परंपरा की तलवार लिए वीर,
महाराष्ट्र-केसरी ने रण में हुँकारा है|
भारतीय अस्मिता का केतु फहराने हेतु,
गुरु रामदास ने दिया सुदिव्य नारा है|
महामति प्राणनाथ से प्रबुद्ध छत्रसाल,
नीति का वितान ताने चली असिधारा है|
राणा राज सिंह वीर दुर्गादास ने सदैव,
अरिदल को विदार शस्त्र को निखारा है||

Saturday, December 17, 2016

राष्ट्र आह्वान

भारतीय विकास संस्कृति साहित्य परिषद का राष्ट्र आह्वान गीत ..बलिया राष्ट्रीय अधिवेशन में पारित..
 "आहुति महाकाव्य '' से पञ्चचामर छंद.....
रचयिता :   महाकवि डॉ. बृजेश सिंह

Varnik छन्द.16 वर्ण .लघु गुरू लघु गुरू...प्रारंभ लघु से व अंत गुरू

अकाल में सहेजना सुबन्धु! सद्विचार को|
रचो चरित्र जो करे सुतीक्ष्ण बुद्धि -धार को।।

सदैव व्यष्टि में भरा समष्टि दिव्य भाव हो|
मनुष्य का मनुष्य से कुटुंब सा लगाव हो|
स्वराष्ट्र के शुभोपयोग लेखनी सुधार को|
रचो चरित्र जो करे सुतीक्ष्ण बुद्धि -धार को||

कभी न भूलना महान वंश की परम्परा|
स्वराष्ट्र के लिए समग्र ज्ञान की ऋतम्भरा|
कुबुद्धि पंथ त्याग दो ग्रहो सुबुद्धि सार को|
रचो चरित्र जो करे सुतीक्ष्ण बुद्धि -धार को||

सुदिव्य वाग्विभूति से मनुष्यता बची रहे |
सरस्वती कृपा रहे सुपद्मजा रची रहे|
जलप्रवाह-सा प्रसन्न सभ्यता प्रसार को|
रचो चरित्र जो करे सुतीक्ष्ण बुद्धि -धार को||

विशिष्ट ज्ञान-पुंज का यहाँ सदैव मान हो|
स्वसंस्कृतिप्रचार का विशाल संविधान हो|
चरित्रवान व्यक्ति के गहो चरित्र सार को|
रचो चरित्र जो करे सुतीक्ष्ण बुद्धि -धार को||

अनन्त शक्तिवान लक्ष्य जीव का महान हो|
गहो कृपाण न्याय हेतु भारतीय मान हो|
प्रताप से रचो पवित्र राष्ट्र-कण्ठहार को|
रचो चरित्र जो करे सुतीक्ष्ण बुद्धि -धार को||

ऊँ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।🙏

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"आहुति महाकाव्य '' से पञ्चचामर छंद.....
रचयिता :  राष्ट्रकवि डॉ. बृजेश सिंह

तजो मनोविकार को गहो स्वधर्म को सदा |
करो विचार नीति जो हरे हरेक आपदा||

मनुष्य का सुधार हो युगीन सद्-विचार हो|
समुच्च राजता समाज चेतना प्रसार हो||

विधर्म-राह जो चले वही विनष्ट हो सदा|
उसे मिले नहीं कभी विभूति भूति सम्पदा||

विकास पन्थ जो चले वही सुलक्ष्य को गहे|
समस्त जीव एक हों समस्त लाभ ही लहे ||

वरीयता कभी नहीं मिले नहीं यहाँ कृपाण को|
वरीयता मिले सदा ऋतम्भरा सुप्राण को||

Thursday, October 4, 2012

ग़ज्रल - जिंदगी का ख्‍वाब कहीं टूटा सा...




ज़िं‍दगी का ख्‍‍वाब कई टूटा टूटा सा दि‍ख रहा।
अपनी ही जिंदगी से कोई लुटा लुटा सा दि‍ख रहा।।

सच के लि‍ये न कि‍या कभी संघर्ष अपनी जिं‍दगी में।
खुद की नज़र में आदमी झूठा झूठा सा दि‍ख रहा।। 

लोग आत्‍मा की आवाज को अनसुना कर चलते रहे।
सच के आइने  से मुंह छुपा छुपा सा दि‍ख रहा।।

अपनी बनाई दुनि‍या में मजबूर होते कभी कभी।
नि‍जाम अपना खुद से छूटा छूटा सा दि‍ख रहा।।

अपनी ही जिंदगी को अपनी तरह न जी सके।
फकत आदमी खुदी से रूठा रूठा सा दि‍ख रहा।।

'बृजेश' वासनाओं की फेहरि‍स्‍तों में खुद्दारी दब चली।
खुदगर्जी तले जमीर का दम घुटा घुटा सा दि‍ख रहा।। 

Sunday, October 9, 2011

ग़ज़ल- कई-कई रूप अब बदल के आती है.....

ग़ज़ल


रचना - डॉ.बृजेश सिंह
गायक - कृष्‍ण कुमार साहू
तबला वादक  - कन्‍हैया श्रीवास
गि‍टार - रवि‍ गुप्‍ता



कई-कई रूप अब बदल के आती है गजल,
आज सतरंगी साँचे में ढल के आती है गजल।

ए कभी जफर का हमसफर बनती ‘बृजेश’
लबों पे दर्द भरे गाने बन जाती है गजल।

खुसरो, दाग, दुष्यंत के लबों पे सजती सँवरती,
आज हिन्दुस्तानी ढाँचे में ढलती है गजल।

अब गजल महज इश्क के दीवानों की सदाएँ नहीं,
आजादी के दीवानों की भी ताने सुनाती है गजल।

हुस्न की मलिका की लटों में उलझ जाती कभी,
कभी सूफियों के मस्त कलामों को महकाती है गजल।

महलों के ख्वाबों में अलसाई सी रहती कभी,
तो कभी गरीब मजलूमों के दर्द बताती है गजल।

ए जहालत पे जम के फटकार लगाती कभी,
कभी इश्क की दिवानी बन इठलाती है गजल।

बिस्मिल, अशफाक रोशन की ताकत बनती कभी,
मस्ती के वतनपरस्ती के तराने सुनाती है गजल।

तासीर इसकी पाक गंगा जमुना सी लगती
जिस धरती से गुजरती रच बस जाती है गजल।

ए गजल तेरे कई रूप देखे है वक्त ने ‘बृजेश’,
वक्त पे जंगे आजादी के तराने कहती है गजल।

Saturday, October 8, 2011

ग़ज़ल - न जरूरी ये हरदम कि कर भला....

ग़ज़ल


रचना - डॉ.बृजेश सिंह
गायक - कृष्‍ण कुमार साहू
तबला वादक  - कन्‍हैया श्रीवास
गि‍टार - रवि‍ गुप्‍ता



न जरूरी ये हरदम कि कर भला तो भला होता है,
कभी होम करते भी किसी का हाथ जला होता है।

इन्सान की जिन्दगी भी क्या अजब शै होती,
सुकून की मस्ती तो कभी दर्द का जलजला होता है।

कई रिश्तों की अगन में झुलस जाता आदमी,
फूँककर भी छांछ पीता जो दूध का जला होता है।

मेहनत ही कामयाबी का सूत्र होता नहीं हर बार,
कर्म और भाग्य में अक्सर मुकाबला होता है।

‘बृजेश’ साथ देकर भी अपनों से चोट खाते कभी,
कौन जाने कब क्या किसी के दिल में पला होता है।